01 August, 2011

उपवास का महत्व

दुनिया के सभी धर्मों में उपवास का महत्व है। खासतौर पर बीमार होने के बाद उपवास को सबसे अच्छा इलाज माना गया है। आयुर्वेद में बीमारी को दूर करने के लिए शरीर के विषैले तत्वों को दूर करने की बात कही जाती है और उपवास करने से इन्हें शरीर से निकाला जा सकता है। इसीलिए 'लंघन्‌म सर्वोत्तम औषधं' यानी उपवास को सर्वश्रेष्ठ औषधि माना जाता है।

संसार के सभी धर्मों में उपवास को ईश्वर के निकट पहुँचने का एक सबसे कारगर उपाय माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के परे यह निर्विवाद सत्य है कि उपवास करने से शरीर स्वस्थ रहता है। संभवतः इसके महत्व को समझते हुए सभी धर्मों के प्रणेताओं ने इसे धार्मिक रीति-रिवाजों से जोड़ दिया है ताकि लोग उपवास के अनुशासन में बँधे रहें।

आयुर्वेद समेत दूसरी सभी चिकित्सा पद्धतियों में उपवास यानी पेट को खाली रखने की प्रथा रही है। हालाँकि हर बीमारी का इलाज भी उपवास नहीं लेकिन यह अधिकांश समस्याओं में कारगर रहता है। दरअसल उपवास का धार्मिक अर्थ न ग्रहण करते हुए इसका चिकित्सकीय रूप समझना चाहिए। पेट को खाली रखने का ही अर्थ उपवास है।

यह आर्थराइटिस, अस्थमा, उच्च रक्तचाप, हमेशा बनी रहने वाली थकान, कोलाइटिस, स्पास्टिक कोलन, इरिटेबल बॉवेल, लकवे के कई प्रकारों के साथ-साथ न्यूराल्जिया, न्यूरोसिस और कई तरह की मानसिक बीमारियों में फायदेमंद साबित होता है। माना तो यहाँ तक जाता है कि इससे कैंसर की बीमारी तक ठीक हो सकती है क्योंकि उपवास से ट्यूमर के टुकड़े तक हो जाते हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि लीवर के कैंसर में उपवास कारगर नहीं होता।

उपवास के अनगिनत फायदे हैं। उपवास जितना लंबा होगा शरीर की ऊर्जा उतनी ही अधिक बढ़ेगी। उपवास करने वाले की श्वासोच्छवास विकार रहित होकर गहरा और बाधा रहित हो जाता है। इससे स्वाद ग्रहण करने वाली ग्रंथियाँ पुनः सक्रिय होकर काम करने लगती हैं। उपवास आपके आत्मविश्वास को इतना बढ़ा सकता है ताकि आप अपने शरीर और जीवन और क्षुधा पर अधिक नियंत्रण हासिल कर सकें।

हमारा शरीर एक स्वनियंत्रित एवं खुद को ठीक करने वाली प्रजाति का हिस्सा है। उपवास के जरिए यह अपने मेटॉबॉलिज्म को सामान्य स्तर पर ले आता हैतथा ऊतकों की प्राणवायु प्रणाली को पुनर्जीवित कर सकता है।

उपवास आपके शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकाल फेंकता है। शरीर में जमा विषैले तत्व श्लेष्मा, थूक, पसीना, उल्टियाँ, कभी-कभी दस्त के रूप में बाहर निकलते हैं। यही वजह है कि जो लोग लंबे उपवास (3 दिन या 7 दिन) करते हैं, उनकी साँसों से दूसरे दिन ही बास आने लगती है।

कई लोगों को उल्टियाँ आने लगती हैं, ये सब विषैले तत्वों के बाहर निकलने के लक्षण हैं। फैट सेल्स, आर्टरी में जमा वसा के थक्के, श्लेष्मा तथा यहाँ तक कि बरसों से जमा रखी हुई चिंताएँ औरभावनाएँ भी बाहर निकल आती हैं परन्तु उपवास का अर्थ भूखे मरना नहीं होता। वस्तुतः उपवास शरीर रूपी मशीन के पाचन तंत्र को आराम देना व उसकी ओवरहालिंग जैसा होता है पर अति सर्वज्ञ वर्जते के अनुसार अतिशय व अवैज्ञानिक तरीके से किए गए उपवास के खराब परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

उपवास कैसे करें ?
उपवास करने का सबसे सुरक्षित तरीका है एक दिन के उपवास से शुरुआत करना। बाद में इसे हफ्ते में एक दिन नियमित रूप से किया जा सकता है। आप शुरुआत में अन्न का त्याग कर सकते हैं तथा इन पदार्थों पर निर्भर रहते हुए दिन निकाल सकते हैं।

* ताजी सब्जियों का रस * फल * पानी * बिना पकी कच्ची सब्जियाँ * ताजे फलों का रस।

इनसे बचें :
पकी हुई सब्जियाँ, अन्न या अन्न के बने दूसरे पदार्थ, रोटियाँ, ब्रेड, बिस्कुट, पास्ता न खाएँ। इसके अलावा चाय, दूध, दही, आइसक्रीम, मक्खन, अंडे, मांस, फास्ट फूड, जंक फूड, तैयार किया हुआ भोजन, आलू की चिप्स, साबुदाने की खिचड़ी, मूँगफली के दाने या फरियाली मिक्चर भी आपके उपवास के मकसद को नष्ट कर सकते हैं।

फायदे :
* मानसिक स्पष्टता में वृद्धि होती है तथा मस्तिष्क का धुंधलका छँट जाता है।
* तत्काल एवं सुरक्षित तरीके से वजन घटता है।
* तंत्रिका तंत्र में संतुलन कायम होता है।
* ऊर्जा का स्तर बढ़ने से संवेदी क्षमताओं में वृद्धि होती है।
* शरीर के सभी अवयवों में ऊर्जा का संचार होता है।
* सेल्युलर बायोकेमेस्ट्री में संतुलन कायम होता है।
* त्वचा संवेदनशील, नर्म और रेशमी हो जाती है।
* आपके हाथ-पैरों का संचालन सरलता से होने लगता है।
* पाचन तंत्र ठीक होकर सुचारु रूप से काम करने लगता है।
* आंतों में भोजन से रस सोखने की क्रिया में वृद्धि होती है।

सावधानियाँ :
उपवास करने वालों को यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि यदि वे किसी असाध्य बीमारी से पीड़ित हैं या किसी बीमारी के लंबे इलाज को ले रहे हैं तो आपको अपने चिकित्सक की सलाह लिए बिना उपवास नहीं करना चाहिए। डायबिटीज के रोगियों व गर्भवती महिलाओं व स्तनपान करा रही माताओं को भी उपवास नहीं करना चाहिए। उपवास अपनी शारीरिक सामर्थ्य से अधिक नहीं करना चाहिए।

(source: webdunia.com)

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