जन्म कुंडली में चन्द्र माता का और सूर्य पिता का कारक होता है, वहीं सूर्य जातक को मिलने वाली तरक्कीका भी कारक होता है। जब सूर्य के साथ राहु जैसा पाप ग्रह आ जाए तब ग्रहण योग बनता है।
सूर्य और राहु की युति जिस भाव में भी हो, उस भाव का फल नष्ट हो जाता है। यदि चौथे, पाँचवें, दसवें, पहले भाव में ग्रहण योग हो तो जातक का जीवन बड़ा ही संघर्षमय रहता है। अतः यह युति किसी भी भाव में हो, मुश्किलें ही पैदा करती है। इस के उपाय के लिए ग्रहण योग की शांति करवाना उचित होता हे।
लेकिन जब सूर्य और राहु का योग नवम भाव में होता है, तो इसे पितृदोष कहा जाता है। जिस के कारण पिता को मृत्युतुल्य कष्ट होता है, जातक के भी भाग्योदय में बाधा आती है। पूर्व जन्म के पापों के कारण या पित्रुओ के शाप के कारण यह दोष कुंडली में प्रकट होता है । इसका निवारण पितृपक्ष में शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है।
Apr 14, 2009
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